जय गणेश गिरिजा सुमन, मंगल मूल सुजान।
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जय गणेश गिरिजा सुमन, मंगल मूल सुजान।
ओढ़ चुनर में तो गई रे सत्संग मे।
मुश्किल हुआ रे मेरा पनघट पे,जाना।
छोटी सी थारी चटी आँगली जी कईयां,गिरवर ने उठाई,हो कईयां पर्वत ने उठाई
एक डाल दो पंछी बैठह्या,कोन गुरु कुन चेला
मेरो अवगुण भरयो शरीर,गुरुजी कईयां तारोगा।
में बन के मोर रंगीला, श्री यमुना तट पे जाऊं।
अरदास हमारी है, आधार तुम्हारा है।
झोली भरने वाला जब, खुद ही झोली में आता है।
कीर्तन में सब आनेवाले, अपना नाम लिखाना,भूल न जाना
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