माया माया माया हरि जी
मैं तो माया में फस गई रे।
चौराहे पर बना उड़ावे पतंग।
रूणझुण रूणझुण घुघरू बाजे,
पिछम धरा रे माय,
झीनी झीनी उड़े रे गुलाल बालाजी तेरे मंदिर में।
चांदी का रथड़ा में प्यारो,
लागे म्हारो सेठ सावरियो,
हंसा हंस मिलया से हंस होई रे।
अवधपुरी के राजा हरिश्चंद्र, हो गए ऐसे दानी
सांवरा थारी माया रो
पायो कोनी पार।
भेद कोनी जाणु वो,
दयालु दीना नाथ।
भोले तेरे पर्वत पे कैसे छा रही छटा निराली है।
अरज लगावे जी,
सांवरिया थासु अरज लगावे जी।
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