बोल हरी बोल हरी हरी हरी बोल।केशव माधव गोविंद बोल।
सुन यशोदा मैया तेरा काला कन्हैया,मटकी फोड़ गया,दूध दही ढोल गया।
बनवारी ओ कृष्ण मुरारी,बता कुन मारी,पूछे यशोदा मात रे
मंदिर जाती मीरा ने सांवरीयो मिल गयो रे
बार बार में तुझे पुकारूं सुनले लखदातार
पांव में घुंघरू बांध के नाचे जपे राम की माला।
क्या ले के आया वंदे क्या ले के जाएगा
गाजे-बाजे से पधारो दादी आज, उड़ीके थारा टाबरिया।
भाई रे मत दिज्यों मावड़ली ने दोष कर्मा री रेखा न्यारी न्यारी रे
है लकड़ी तूं बन लकड़ी, अब देख तमाशा लकड़ी का
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