श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी।
Author: Pushpanjali
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव
बाल समय रवि भक्ष लियो, तब तिनहुं लोक भयो अंधियारो
ना ही किनारा ना ही सहारा, किसी की ना दरकार जो संग में तू मेरे।
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार
कोई नही इस जग में अपनो,जान ले।
गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरे।
आरती श्री रामायण जी की
सावन का महीना घटाएं घनघोर
पगथलिया में खाज चाल रही,खाटू जानो है
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