उठो भवानी भोर भयो है, जल ढालन के आए मां।
बिगड़ी मेरी बना दे ,इस बार नवरात्रों में।
चौरासी घंटा बाजे रे ,मां काली के भवन में।
मां गुफा में बैठी हो,बड़ी सुंदर लगती हो।
भवन में बैठकर मैया, मुझे आवाज देती है।
पल्लो लटक, र म्हारो पल्लो लटक
रूक ज्यायी ए रेल लुहारू की, मेरो कद परण्यो घर आव
आज्या साँवरिया तू द्रोपदी की लाज बचा जा रे,
सजनी हमारी धुंऐदार है, सुरत से लगती थानेदार है।
मेंहन्दी राचणी रो पेड़, लगादे रसीया मेंहन्दी राचणी रो
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