सिमरु प्रथम नित तुमको गुणेशा,
दुर करो मम सकल कलेशा,
आरती गिरिजा नंदन की,
गजानन असुर निकंदन की।।
जिनके ह्रदय में हरपल,
सीताराम जी करे बसेरा,
वो हनुमान है मेरा,
उठो हे पवनपुत्र हनुमान,
सागर पार जाना है,
मंजीरो सीतार मीरा ऐ लिना हाथ,
अब राणाजी ने कहिजो के गिरधर मारो नाथ,
बंसी वाले के चरणों में, सर हो मेरा,
फिर ना पूछो, कि उस वक़्त क्या बात है।
येते मी माघारी कान्हा जरा थांब ना ग
जो तू मिटाना चाहे जीवन की तृष्णा
सुबह श्याम बोल बन्दे कृष्णा कृष्णा कृष्णा।
घर घर में बस रहा है मेरा श्याम खाटू वाला,
तेरे दर से बढ़कर ए बंसी वाले दुनिया में देखा कोई दर नहीं
You must be logged in to post a comment.