बलिहारी बलिहारी नंद लाल की,
बैठे परदे में कान्हां,
गजब हो गया,
सब उमर बीत गई धोखे में परिणाम न जाने क्या होगा
राम बुलावा आवे एक दिन उस बुलावे से डरियो
संकट में झुंझन वाली की, सकलाई देखि है। मेरे संग संग चलती, दादी की परछाई देखि है।
होली खेलूंगी फागण में, मैं तो श्याम धणी के द्वार, होली खेलूंगी।
लक्ष्मण के बान लाग्यो शक्ति,लक्ष्मण के।
लाग्यो लक्ष्मण जी के बाण,
थाने जानो जरूरी काम,
मन बस गयो नन्द किशोर,
अब जाना नहीं कही और,
बसा लो वृन्दावन में,
देर से आने की तेरी आदत,
बाबा बहुत पुरानी है,
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