संवारे घनश्याम तुम तो
प्रेम का अवतार हो।
लम्बोदर पीताम्बर मनहारी।
आ जाओ दुर्गे मैया मेरे मकान में,
मंगल मूर्ति गणपति विद्यापति,
विघ्नहर्ता सुखकर्ता,
मनोकामना पूरी कर्ता,
श्यामा आ भी जा मेरे गरीब खाने में,
अब के बरस मोरे गाँव में बप्पा गुजरी सूत गणराज,
गणपति विघ्न,
विनाशक जय हो,
मेरे अंगना उगी तुलसा रानी, मैं झूम झूम के गाउ
मेरे सर पे भी माँ अपने हाथ रोल दे,
You must be logged in to post a comment.