सखी पनघट पर यमुना के तट पर लेकर पहुंची मटकी
रोते हैं जो याद में तेरी, उनको नहीं भुला देना,
मेरे कान्हा तेरा दीदार मुझ को पाना है
मैं तो गिरधर के घर जाऊं, गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम
मैं कान्हा की कान्हा मेरा कहां तुम जा छिपे मोहन,
मैं लजपालाँ दे लड़ लगियाँ मेरे तों ग़म परे रहँदै
श्याम थे आछा बिराज्या, सिंगोली मायने,
याद तेरी फिर आई खाटू श्याम जी,
मेरे श्याम तेरी ये रहमत न होती
उज्जैन में विराजे भोलेनाथ जी।
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