भवन रंगीला माँ का शेर पीला पीला है।
मैंया के भवन के जबारे मन बसे हमारे।
नथ मारी गम गई सा ब्रज का वासी
चोला लाल चढ़ाऊं मुरादे पूरी करदे।
मेरे घर आओ मैया नवरात्रो में
काली सिल पे नाचे री भवानी काली सिल पे।
ले चल अपनी नागरिया,
अवध बिहारी साँवरियाँ ।
छोटो सो गजानन लालो हठ पकड़ियो।
आंखें कजरे की धार गल मोतियों के हार
दामण 52 गज का पहर कीर्तन में जाऊँगी,
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