अमरापुर से चली भवानी गोरख छलबा आयी रे
म्हारे मालिक के दरबार, आवणा जतीक
अब तो मान कयो मेरी माय सांवरियो परणाय
पिंजरै वाली मैना, भजो ना सिया राम राम ।
चादर झीणी राम झीणी, या तो सदा राम रस पिणी ॥
मेरा सांवरिया बड़ा दिलदार निकला,
बाबुल की बहुत ही प्यारी थी,ससुराल ने कदर मेरी जानी ना।बाबुल की बहुत ही प्यारी थी,ससुराल ने कदर मेरी जानी ना।
मत सोच समझ कल क्या होगा
रंग चढ़ गया मोपे श्याम का,में तो हो गया मालामाल,दीवाना बन गया श्याम का
हनुमत की पूंछ ने का माल कियों रे,
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