पर्वत पर बैठे भोलेनाथ, गोरा रानी खत भेजे।
संतों की गली जाना रे मन बेईमान।
मैं बन जाऊं धूली श्यामा तेरी वृंदावन की
गुरु सा ऐसो रंगवाए दो म्हाने लेहरियो
पंडा को लग गई चुड़ेलन की पंडा उड़तो फिरे
तू चाल रुणिचे चाल एक दिन तो सुनसी
मैं तो रानी बनूँगी बृज धाम की,
मेरा सुखी रहे परिवार, माता कृपा करो
अपना पूरा शेर सजा करके मां जगदंबे चाली।
मैं क्या करूँ राम, सासू मॉडर्न मिल गई
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