हे मेरे गुरुदेव करुणा सिंधु करुणा कीजिये
प्रेम रा मारग बाक़ा रे।
सूरा देवे शीश प्रेम में ,
अर्पण वाका रे।
कान्हा मेरी सांसो पे,
नाम अपना लिखा लेना,
मंगल कलश उठाने वाली समझो खुल गया भाग तेरा।
मैं कैसे होली खेलूंगी,
या सांवरिया के संग,
बस इतनी कृपा करना,
मेरा वक्त सुधर जाएं,
तेरे दरबार में सर झुकाती रहूं,
तू बुलाता रहे और मैं आती रहूं,
इतना सुंदर मुखड़ा उस पर ऐसा सिंगार।
जट्टा जुट में गंग विराजे,माथे अर्ध चंद्रमा साजे।
मैं आया तेरे द्वार हे बजरंगी
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