पर्वत पर भांग धतूरा है,
बैकुंठ में तुलसा प्यारी हैं,
रख ले माँ बिन तनखाओ पाली नाथ नू रख ले माँ,
वारी बरसाने वाली बारी तज गए बनवारी,
गुरु चरण कमल बलिहारी रे,
मेरे मन की दुविधा टारी रे…..
पूर्ण हो तुम, तुम शेष हो,
अति वशिष्ठ तुम विशेष हो,
कैलाश पर्वत पर बाज रहे घुंघरू,
नाच रहे भोला बजा रहे डमरु…..
तूने पकड़ा जो हाथ मेरा,
ग़म के बादल जो छंटने लगे,
तुम भक्तों की सुन लो पुकार,
तेरी प्यारी सी है मुस्कान,
नाम जो अंबे रानी का मन से प्राणी गाएगा,
बरसे धारा बरसे धारा, गुरु ऋषभ की याद में, आंखों से ये बरसे धारा ।।
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