प्यासा हिरन जैसे, ढूंढे है जल को
ऐसे प्रभु मैं तुझे खोज रहा
हमेशा प्रेम वाले,
सांचे में ढाल के रक्खे,
तेरे चरण कमल में श्याम, लिपट जाऊं रज बनके,
जो श्याम पर फिदा हो,
उस तन को ढूंढते है,
दीदार निराला है तेरा,
श्रृंगार निराला है तेरा,
कृपा की ना होती जो,
आदत तुम्हारी,
राधे राधे बोलो चलो जी बरसाने,
मेरे मन मधुबन में आओ वृन्दावन रेहन वालिया।
मंद मंद मुस्काये रे भोला काहे भांग धतूरा खाये,
तेरी जटा से बहती रहते है गंगा की धारा, शंकरा हे मेरे शंकरा।
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