मैं उस दरबार का सेवक हूँ,
जिस दर की अमर कहानी है,
ना मैं राधा ना मैं मीरा,
ना मैं सुदामा जैसी हूँ,
मन में उठन लागी हूक, सांवरिये के नाम री,
आयो फागणियो रंगीलो, चाला खाटू नगरी …
जब तक सांस चले ये तब तक साथ निभाना ,
कब आओगे कब आओगे ,
और कितना हमें तड़पाओगे
तुझे अपना जान के बाबा,
मैं तेरे दर पर आऊं,
किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊँ।
थक गई मेरी अखियां बड़ी, तू क्या जाने मैं कब से खड़ी।
हरी की कथा सुनाने वाले,
तुमको लाखों प्रणाम,
मेरे सांवरे तुमको आना पड़ेगा, किया है जो वादा निभाना पड़ेगा।
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