हिमगिरि सुता रूप जगदम्बा, ब्रह्मचारिणी माते, दूजी ज्योतिर्मयी शक्ति तुम,भवभयहारिणि माते।
बायें हाथ कमण्डलु शोभित, दायें हाथ जप माला। जगत-जननि माँ ‘पार्वती’ ने, तपसी रूप सम्हाला।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 पति-रूप शिवजी को पाने, बहुत कठिन व्रत लीन्हाँ, सहस वर्ष फल-फूल खायके, आप घोर तप कीन्हाँ।।
तीन-सहस-वर्षों तक सूखे, विल्व-पत्र तुम खाये, वर्षा – धूप-शीत सह तुमने, वर्षा-धूप-२ हाय महा दुःख पाये। 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺कई वर्षों तक निराहार रह, निर्जल ही तप कीन्हाँ, हो प्रसन्न तब ‘महादेव’ ने, मनवाञ्छित वर दीन्हाँ ।।
नाम पड़ा तबसे ‘ब्रह्मचारिणि’, हे सुखशांतिस्वरूपा, जो ध्याये मनवचन से तुमको, पड़े न वह भवकूपा ।🌺🌺🌺🌺🌺 हे जगजननी ‘ब्रह्मचारिणी’, कृपादृष्टि अब कीजे, श्रीचरणारविन्द की भक्ति, मोहि दया कर दीजे।।
तप-वैराग्य-त्याग-दात्री, हे दोष-निवारिणि माता, करूँ वन्दना मैं ‘अशोक’, हे तपस्चारिणी माता।।
हिमगिरि सुता रूप जगदम्बा, ब्रह्मचारिणी माते, दूजी ज्योतिर्मयी शक्ति तुम, भवभयहारिणि माते ।।